बंटवारे के बाद कराची से वापस आए थे जगदीप, करना पडा संघर्ष
मुंबई । बालीवुड के हास्य अभिनेता जगदीप ने ‘शोले’ में सूरमा भोपाली का किरदार निभाकर दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई। लेकिन इस सफलता तक पहुंचने का उनका सफर भूख, गरीबी और दर्द से भरा हुआ था। 29 मार्च 1939 को मध्यप्रदेश के दतिया में जन्मे जगदीप एक संपन्न मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता एक महाराजा के यहां वकील थे, लेकिन उनकी असमय मृत्यु ने पूरे परिवार को गरीबी में धकेल दिया। मां बच्चों को लेकर कराची चली गईं, लेकिन भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान हालात ऐसे बने कि उन्हें फिर भारत लौटना पड़ा। इस दौरान जगदीप ने आंखों के सामने हिंसा, लहूलुहान सड़कों और उजड़े हुए परिवारों को देखा।
मुंबई आकर उनकी मां को अनाथालय में खाना पकाने का काम मिला, जबकि जगदीप ने पढ़ाई छोड़ दी और टिन के कारखानों में काम करना शुरू किया। हालत इतने खराब हो चुके थे कि परिवार के पास खाने को भी कुछ नहीं बचा था। कई बार जगदीप बेकरी के फर्श पर गिरी ब्रेड के टुकड़ों को उठाकर खाते, जिनमें कभी चूहे और कभी कॉकरोच मुंह मार चुके होते। वह गंदगी हटाकर वही टुकड़े खाकर खुद को जिंदा रखते। काम की तलाश करते हुए एक दिन उन्हें बी.आर. चोपड़ा की फिल्म ‘अफसाना’ में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम मिला, जिससे उन्हें तीन रुपये मेहनताना मिला।
यही से उनके अभिनय सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद उन्होंने ‘हम पंछी एक डाल के’, ‘आर पार’, ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ जैसी फिल्मों में काम किया। उनकी एक्टिंग से प्रभावित होकर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपने निवास पर नाश्ते के लिए बुलाया और अपनी छड़ी उन्हें तोहफे में दी। करीब 400 फिल्मों में अभिनय कर चुके जगदीप ने अपनी मेहनत और जज्बे से वह मुकाम हासिल किया, जो लाखों लोगों के लिए एक सपना है। लेकिन इसके पीछे छुपी भूख, बेबसी और संघर्ष की दास्तान आज भी प्रेरणा बनकर दिल को छू जाती है। बता दें कि बॉलीवुड की रंगीन दुनिया के पीछे कई सितारों की जिंदगी में संघर्ष की ऐसी कहानियां छिपी होती हैं, जो इंसान को भीतर तक झकझोर देती हैं।

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